कभी सूरज की किरणें भी जमीन तक नहीं पहुंचती थीं बादलखोल के घने जंगलों में… अब अवैध कटाई और शिकार से बढ़ी चिंता, तस्करी रोकने बेने में भी चौथा बेरियर लगाने की तैयारी में विभाग....ग्रामीण बोले, रात में खुला रहेगा रास्ता तो कैसे रुकेगी तस्करी
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कभी सूरज की किरणें भी जमीन तक नहीं पहुंचती थीं बादलखोल के घने जंगलों में… अब अवैध कटाई और शिकार से बढ़ी चिंता, तस्करी रोकने बेने में भी चौथा बेरियर लगाने की तैयारी में विभाग....ग्रामीण बोले, रात में खुला रहेगा रास्ता तो कैसे रुकेगी तस्करी

सरगुजा एलिफेंट रिजर्व के उपनिदेशक श्रीनिवास तनेटि ने किया स्थल निरीक्षण, नारायणपुर सर्किल के बेने क्षेत्र में नए बेरियर लगाने के निर्देश

बेंद, डूमरपानी और साहीडाँड़ बेरियरों की व्यवस्था पर उठे सवाल, कई जगह दिन-रात खुले रहते हैं गेट — बिना जांच गुजर रहे वाहन

यदि नहीं हुई कड़ी निगरानी तो खतरे में पड़ सकती है बादलखोल की हरियाली, वन्यजीवों का सुरक्षित ठिकाना बन सकता है तस्करों का अड्डा

साहीडाँड़ का वन बेरियर

नारायणपुर 09 मार्च 2026 : 
सरगुजा एलिफेंट रिजर्व के अंतर्गत आने वाला बादलखोल अभ्यारण्य एक समय अपनी घनी हरियाली, दुर्लभ वन्यजीवों और शांत प्राकृतिक वातावरण के लिए दूर-दूर तक जाना जाता था। पहाड़ों और साल के घने वनों से घिरा यह क्षेत्र आज भी प्राकृतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है, लेकिन बीते कुछ वर्षों से यहां अवैध लकड़ी कटाई, वन्यजीवों के शिकार और लकड़ी तस्करी की गतिविधियों को लेकर विभाग की चिंता बढ़ती जा रही है।

वन विभाग इन गतिविधियों पर नियंत्रण पाने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है। इसी कड़ी में विभाग ने पहले तीन स्थानों पर बेरियर स्थापित किए थे और अब चौथा बेरियर लगाने की तैयारी की जा रही है। हालांकि ग्रामीणों का कहना है कि यदि निगरानी व्यवस्था मजबूत नहीं की गई तो केवल बेरियर लगाने से स्थिति में कोई सुधार नहीं आएगा।

1975 में मिला अभ्यारण्य का दर्जा

जानकारी के अनुसार बादलखोल अभ्यारण्य का रेंज कार्यालय नारायणपुर में स्थित है। इस अभ्यारण्य को वर्ष 1975 में आधिकारिक स्वीकृति मिली थी। इससे पहले यह क्षेत्र सामान्य वन क्षेत्र के रूप में जाना जाता था।

स्थानीय लोगों के अनुसार पुराने समय में यह इलाका राजा-महाराजाओं का प्रमुख शिकारगाह हुआ करता था। उस दौर में यहां के जंगल इतने घने हुआ करते थे कि दिन के समय भी जंगल के अंदर अंधेरा जैसा वातावरण रहता था। कहा जाता है कि पेड़ों की घनी छाया के कारण सूर्य की किरणें भी धरती तक नहीं पहुंच पाती थीं।इसी घनेपन और बादलों जैसी छाया के कारण इस क्षेत्र का नाम “बादलखोल” पड़ गया, जो आज भी इस जंगल की पहचान बना हुआ है।

पहाड़ी और साल वनों की समृद्धि

बादलखोल अभ्यारण्य ईब और डोड़की नदियों के किनारे फैले साल वनों से घिरा एक महत्वपूर्ण पहाड़ी पारिस्थितिक तंत्र है। यहां की जलवायु और जैव विविधता इसे पर्यावरण की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बनाती है।एक समय यहां बाघ, तेंदुआ, चीतल, सांभर और कई दुर्लभ पक्षियों की भरपूर मौजूदगी हुआ करती थी। जंगल की शांति और प्राकृतिक संतुलन के कारण यह क्षेत्र वन्यजीवों के लिए सुरक्षित आश्रय माना जाता था।

हालांकि वर्तमान समय में बाघ जैसे बड़े वन्यजीव अब इस क्षेत्र में दिखाई नहीं देते, लेकिन कोटरी, हाथी, तेंदुआ, जंगली सुअर और अन्य वन्य प्राणियों की मौजूदगी अभी भी यहां देखी जाती है। इसके अलावा कई प्रकार के पक्षी और छोटे वन्य जीव भी इस क्षेत्र की जैव विविधता को बनाए हुए हैं।

अवैध कटाई और शिकार से बढ़ी चिंता

 पिछले कुछ वर्षों से बादलखोल अभ्यारण्य में अवैध लकड़ी कटाई और शिकार की गतिविधियां समय-समय पर सामने आती रही हैं। जंगल के अंदर से कीमती लकड़ियों की तस्करी की सूचनाएं भी बीच-बीच में मिलती रहती हैं। जंगल का क्षेत्र काफी विस्तृत और दुर्गम होने के कारण तस्कर अक्सर रात के समय इन गतिविधियों को अंजाम देते हैं। ऐसे में वन विभाग के लिए इन पर पूरी तरह नियंत्रण करना चुनौतीपूर्ण बन जाता है।

नारायणपुर सर्किल के बेने में लगेगा नया बेरियर

तस्करी रोकने के लिए लगाए गए बेरियर

इन्हीं गतिविधियों पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से वन विभाग ने पहले तीन स्थानों पर बेरियर लगा चुका है । इनमें एक बेंद सर्किल में और दूसरा साहीडाँड़ सर्किल में तीसरा डूमरपानी मे  स्थापित किया गया है।

अब विभाग द्वारा चौथा बेरियर नारायणपुर सर्किल के बेने क्षेत्र में लगाने की तैयारी की जा रही है। हाल ही में सरगुजा एलिफेंट रिजर्व के उपनिदेशक श्रीनिवास तनेटि स्वयं मौके पर पहुंचे और प्रस्तावित स्थान का निरीक्षण कर अधिकारियों को यहां बेरियर लगाने के निर्देश दिए।

विभागीय सूत्रों के अनुसार इस बेरियर के निर्माण का उद्देश्य वन क्षेत्र में आने-जाने वाले वाहनों की निगरानी बढ़ाना और अवैध गतिविधियों पर नियंत्रण करना है।

डूमरपानी बेरियर

पुराने बेरियरों की व्यवस्था पर उठे सवाल

हालांकि ग्रामीणों का कहना है कि केवल नए बेरियर लगाने से समस्या का समाधान नहीं होगा। उनका कहना है कि पहले से लगे बेंद ,डूमरपानी और साहीडाँड़ बेरियरों की व्यवस्था ही सुचारू रूप से नहीं है,स्टाफों की कमी है।

ग्रामीणों के अनुसार बेंद में लगा बेरियर सामान्यतः बंद रहता है, लेकिन वाहन आने पर उसे खोलकर जाने दिया जाता है। इस मार्ग से गुजरने वाले वाहनों की जांच लगभग नहीं के बराबर होती है। कई बार तो रात के समय बेरियर पूरी तरह खोल दिया जाता है, जिससे वाहनों का आवागमन बिना जांच के होता रहता है। वन्ही इसी सर्किल के डूमरपानी का बेरियर होना न होना एक बराबर है दिन रात खुला रहता है । यंहा कोई स्टाफ नही रहता है स्तानीय लोगों का कहना है कि यंहा बेरियर दिन रात खुला रहता है।

इसी प्रकार साहीडाँड़ में लगे बेरियर की स्थिति भी संतोषजनक नहीं बताई जा रही है। यहां दिन और रात दोनों समय बेरियर खुला रहता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यहां केवल तेंदूपत्ता से लदे वाहनों की एंट्री रजिस्टर में दर्ज की जाती है, जबकि अन्य वाहनों की जांच होती ही नही है।

रात के समय होती है ज्यादा तस्करी

ग्रामीणों का कहना है कि अवैध लकड़ी कटाई और वन्यजीवों के शिकार की अधिकांश घटनाएं रात के समय ही होती हैं। ऐसे में यदि बेरियर रात में खुले रहते हैं तो उनका कोई विशेष लाभ नहीं मिल पाएगा।विभाग को सही मायने में तस्करी पर अंकुश लगाना है तो सभी बैरियरों में रात को भी डियूटी लगानी होगी । 

लोगों का मानना है कि यदि बेने में बनने वाले नए बेरियर की भी यही स्थिति रही तो उसका उद्देश्य अधूरा रह जाएगा। दिन के समय तो वाहनों की एंट्री दर्ज हो जाएगी, लेकिन यदि रात में बेरियर खुला रहेगा तो तस्करी और अवैध गतिविधियों को रोकना मुश्किल होगा।

कड़ी निगरानी की जरूरत

ग्रामीणों और क्षेत्र के जागरूक लोगों ने वन विभाग के उच्च अधिकारियों से मांग की है कि बेंद,डूमरपानी, बेने और साहीडाँड़  में लगाए गए बेरियरों पर दिन के साथ-साथ रात में भी कर्मचारियों की ड्यूटी अनिवार्य रूप से लगाई जाए। 

साथ ही खासकर स्टेट हाइवे मार्ग पर स्थित साहीडाँड़ बेरियर इस क्षेत्र का सबसे महत्वपूर्ण बैरियरों में से एक है यंहा बिना कारण दिन हो या रात खुला न रखा जाए और वाहनों के आने जाने पर ही उसे खोलने की व्यवस्था लागू करवाई जाए।

स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि विभाग इस दिशा में सख्ती और नियमित निगरानी सुनिश्चित करे तो बादलखोल जैसे महत्वपूर्ण वन क्षेत्र में अवैध लकड़ी तस्करी और शिकार की घटनाओं पर काफी हद तक रोक लगाई जा सकती है।

जंगल बचाने के लिए जरूरी है सतर्कता

बादलखोल अभ्यारण्य केवल वन विभाग ही नहीं बल्कि पूरे क्षेत्र की प्राकृतिक धरोहर है। यहां के घने साल वन, पहाड़ और वन्यजीव इस इलाके के पर्यावरणीय संतुलन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

ऐसे में जरूरत इस बात की है कि वन विभाग और स्थानीय समुदाय मिलकर इस जंगल की सुरक्षा के लिए गंभीर प्रयास करें, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी बादलखोल की हरियाली और जैव विविधता का लाभ उठा सकें।

विभाग को इस जगह पर भी लगानी चाहिए बेरियर

बादलखोल अभ्यारण्य क्षेत्र में लकड़ी तस्करी की आशंका को लेकर  विभाग को गायलूँगा और बच्छरांव मार्ग पर बेरियर लगाने की आवश्यकता है। सूत्रों के अनुसार गायलूँगा, कलिया और डूमरपानी होते हुए एक रास्ता बगीचा की ओर निकलता है, जिसका उपयोग लकड़ी तस्करों द्वारा किया जाता है। ऐसे में गायलूँगा में बेरियर लगाए जाने की भी आवश्यकता है।

बच्छरांव से कई दिशाओं में निकलते हैं रास्ते

इसी तरह बच्छरांव से एक मार्ग झरगांव की ओर तथा दूसरा मार्ग मटासी होते हुए नारायणपुर की ओर जाता है। बताया जाता है कि इन मार्गों का उपयोग भी लकड़ी की अवैध तस्करी के लिए किया जाता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि इन रास्तों पर निगरानी के अभाव में तस्कर आसानी से जंगल से लकड़ी बाहर निकाल लेते हैं।

उच्च अधिकारी  इस पूरे मामले में संज्ञान लेकर गायलूँगा तथा बच्छरांव में स्थायी बेरियर स्थापित करने का विचार करनी चाहिए, ताकि अभ्यारण्य के जंगलों को अवैध कटाई और तस्करी से बचाया जा सके।

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