सनातन परंपरा का भव्य उत्सव: नारायणपुर में पूरे धार्मिक विधि-विधान के साथ निकली भगवान जगन्नाथ की बाहुड़ा यात्रा, नगर में गूंजा 'जय जगन्नाथ'
नारायणपुर, 24 जुलाई। आस्था, परंपरा और सनातन संस्कृति का अनुपम संगम शुक्रवार को नारायणपुर में देखने को मिला, जब भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की बाहुड़ा रथ यात्रा (वापसी रथ यात्रा) पूरे धार्मिक विधि-विधान और भव्यता के साथ निकाली गई। मौसी के घर से अपने धाम की ओर लौटते प्रभु के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ा। पूरे नगर में "जय जगन्नाथ" के जयघोष, शंखध्वनि, घंटानाद और भजन-कीर्तन से वातावरण भक्तिमय हो गया।
धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान जगन्नाथ स्नान पूर्णिमा के बाद अस्वस्थ हो जाते हैं। इस दौरान वे सार्वजनिक दर्शन नहीं देते और औषधीयुक्त काढ़ा ग्रहण कर स्वास्थ्य लाभ करते हैं। स्वस्थ होने के उपरांत भगवान अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ रथ पर आरूढ़ होकर मौसी के घर (गुंडीचा मंदिर) की यात्रा करते हैं। वहां लगभग आठ दिनों तक विश्राम करने के बाद बाहुड़ा यात्रा के माध्यम से पुनः अपने धाम लौटते हैं। यही वापसी यात्रा सनातन परंपरा में अत्यंत पवित्र और पुण्यदायी मानी जाती है।

नारायणपुर में भी इसी परंपरा का श्रद्धापूर्वक निर्वहन किया गया। शाम चार बजे रामेश्वरम मंदिर, जिसे स्थानीय रूप में भगवान का मौसी घर माना गया है, से भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा रथ पर विराजमान होकर नगर भ्रमण के लिए निकले। यात्रा मुख्य मार्गों से होती हुई गणेश मंदिर पहुंची, जहां धार्मिक अनुष्ठानों के साथ इसका समापन हुआ।
यात्रा मार्ग में विभिन्न स्थानों पर श्रद्धालुओं ने रथ की पूजा-अर्चना की, पुष्प चढ़ा कर प्रभु का स्वागत किया तथा परिवार, समाज और विश्व के कल्याण की कामना की। महिलाओंऔर, युवाओं ने रथ खींचने का सौभाग्य प्राप्त किया और बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी ने उत्साहपूर्वक इस धार्मिक आयोजन में भाग लिया।
सनातन परंपरा में बाहुड़ा यात्रा केवल भगवान की वापसी नहीं, बल्कि यह संदेश भी देती है कि प्रभु अपने भक्तों के बीच पहुंचकर उनकी पीड़ा हरते हैं और पुनः अपने धाम लौटकर समस्त सृष्टि के मंगल का आशीर्वाद प्रदान करते हैं। नारायणपुर की बाहुड़ा रथ यात्रा ने एक बार फिर आस्था, संस्कृति और सामाजिक एकता की जीवंत मिसाल देखने को मिली ।
