अप्रैल में ही सूखने लगे जलस्रोत : 1000 मिमी बारिश के बावजूद जिले के सूखते जलस्रोत, गिरता भू-जल और बढ़ता संकट—प्राकृतिक संपदा पर भारी पड़ रहा मानवीय लालच

सूखते तालाब
निरंजन मोहन्ती-नारायणपुर
नारायणपुर 18 अफ़्रैल 2026 :- अप्रैल की शुरुआत होते ही जशपुर जिले में जल संकट के हालात साफ नजर आने लगे हैं। जिन नदियों, नालों और तालाबों में कुछ समय पहले तक पानी लबालब भरा रहता था, वे अब तेजी से सूखते जा रहे हैं। जिले के कई हिस्सों में छोटी नदियां पतली धार में सिमट गई हैं, नालों का बहाव लगभग खत्म हो चुका है और तालाबों के तल में दरारें दिखाई देने लगी हैं। भू-जल स्तर में लगातार गिरावट के कारण गांवों में लगे हैंडपंप भी जवाब देने लगे हैं, जिससे लोगों को पीने के पानी के लिए दूर-दूर भटकना पड़ रहा है।
सबसे हैरानी की बात यह है कि जशपुर जिला प्रदेश के सर्वाधिक वर्षा वाले जिलों में शामिल है, जहां हर साल औसतन करीब 1000 मिमी बारिश होती है और घने वन क्षेत्र इसकी पहचान रहे हैं। इसके बावजूद हर साल गर्मी के मौसम में पानी की किल्लत होना इस बात का संकेत है कि जिले में जल प्रबंधन और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में कहीं न कहीं गंभीर चूक हो रही है। जिले के मनोरा, जशपुर और बगीचा जैसे पहाड़ी इलाकों में बारिश तो भरपूर होती है, लेकिन पानी को रोकने और सहेजने की कोई ठोस व्यवस्था नहीं होने के कारण यह तेजी से नालों और नदियों के जरिए बहकर बाहर निकल जाता है। नतीजतन, न तो भू-जल स्तर रिचार्ज हो पाता है और न ही सालभर जल उपलब्धता बनी रहती है।

धधकते जंगल और पहाड़
जिले में बढ़ते जल संकट के पीछे सबसे बड़ा कारण अवैध वनों की कटाई और पर्यावरणीय असंतुलन माना जा रहा है। लंबे समय से सक्रिय लकड़ी माफियाओं द्वारा बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई की जा रही है, वहीं जंगलों में आग लगाकर जमीन खाली करने और खनन गतिविधियों ने भी प्राकृतिक संतुलन को बुरी तरह प्रभावित किया है। पहले यही जंगल वर्षा के पानी को अपने भीतर समेटकर धीरे-धीरे नदियों और नालों में छोड़ते थे, जिससे पूरे साल जलस्रोतों में पानी बना रहता था, लेकिन अब जंगलों के घटते क्षेत्र के कारण पानी सीधे बहकर खत्म हो जाता है और जमीन के अंदर जाने का अवसर नहीं मिल पाता।

नदी नालों में अतिक्रमण
स्थिति को और गंभीर बनाने में अतिक्रमण की भूमिका भी कम नहीं है। जिले में नालों, नदी किनारों और पुराने तालाबों पर तेजी से कब्जा बढ़ रहा है। कई जगहों पर किसानों द्वारा नदी के हिस्सों को रोककर उसे खेतों में तब्दील कर दिया गया है, तो वहीं शहरी क्षेत्रों में सूखी जमीन समझकर नालों और तालाबों पर मकान बना लिए गए हैं। कांक्रीट के बढ़ते विस्तार ने पानी के प्राकृतिक प्रवाह और जमीन में रिसाव के रास्तों को पूरी तरह बाधित कर दिया है, जिससे भू-जल स्तर लगातार नीचे गिरता जा रहा है।
जशपुर जिले से निकलने वाली ईब, ढोंढकी और मैनी जैसी प्रमुख नदियां भी इस संकट से अछूती नहीं हैं। यदि जलस्तर में इसी तरह गिरावट जारी रही, तो इन नदियों का प्रवाह भी प्रभावित होगा, जिसका असर न केवल जिले बल्कि निचले इलाकों के बड़े भूभाग पर पड़ेगा। यह स्थिति आने वाले समय में और भी गंभीर जल संकट का संकेत दे रही है।
एक और चिंताजनक पहलू यह है कि जहां पहले स्थानीय लोग जंगलों और जलस्रोतों के संरक्षण में अहम भूमिका निभाते थे, अब वही लोग निजी लाभ के लिए पेड़ों की कटाई और अतिक्रमण में शामिल होते नजर आ रहे हैं। पर्यावरण के प्रति घटती संवेदनशीलता और बढ़ता स्वार्थ इस संकट को और गहरा कर रहा है।

तालाबों की स्थिति
लोगों का मानना है कि यदि समय रहते वर्षा जल संचयन के लिए ठोस संरचनाएं नहीं बनाई गईं, अवैध कटाई और अतिक्रमण पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई और पुराने जलस्रोतों का पुनर्जीवन नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में जशपुर गंभीर जल संकट वाले क्षेत्रों में शामिल हो सकता है।
प्राकृतिक संसाधनों और जैव विविधता से भरपूर जशपुर आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां थोड़ी सी लापरवाही इसे पानी के लिए तरसते जिले में बदल सकती है। इस परिप्रेक्ष्य में आवश्यक है कि प्रशासन और समाज दोनों मिलकर ठोस कदम उठाएं। वर्षा जल संचयन के लिए छोटे-बड़े संरचनाओं का निर्माण, पुराने तालाबों और जलस्रोतों का पुनर्जीवन, वनों की सुरक्षा और अतिक्रमण पर सख्त कार्रवाई—ये सभी उपाय अब विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता बन चुके हैं। साथ ही, स्थानीय समुदाय की भागीदारी सुनिश्चित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि स्थायी समाधान तभी संभव है जब जनसहभागिता हो। यदि अभी भी स्थिति को गंभीरता से नहीं लिया गया, तो “पानीदार जशपुर” की पहचान इतिहास बनकर रह जाएगी। आने वाले वर्षों में यह संकट और विकराल रूप ले सकता है, जहां पानी केवल संसाधन नहीं, बल्कि संघर्ष का कारण बन जाएगा
अफ़्रैल माह में नदियों की स्थिति

