अब केवल मदिरा नहीं, सुरक्षित खाद्य उपयोग और पोषण का स्रोत बन रहा महुआ ,पारंपरिक वनोपज से सुपरफूड की ओर बढ़ता जशपुर,महुआ बना आजीविका का मॉडल   
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अब केवल मदिरा नहीं, सुरक्षित खाद्य उपयोग और पोषण का स्रोत बन रहा महुआ ,पारंपरिक वनोपज से सुपरफूड की ओर बढ़ता जशपुर,महुआ बना आजीविका का मॉडल   

जशपुर 9 फरवरी 2026/ जशपुर से सुकमा तक महुआ आधारित आजीविका मॉडल का व्यावहारिक आदान–प्रदान
जशपुर जिले में महुआ को लेकर पारंपरिक सोच में धीरे-धीरे एक ठोस बदलाव देखने को मिल रहा है। जो महुआ कभी केवल स्थानीय मदिरा से जोड़कर देखा जाता था, वही आज सुरक्षित खाद्य उपयोग, पोषण और मूल्य संवर्धन के माध्यम से एक नए सुपरफूड के रूप में पहचाना जाने लगा है। जशपुर स्थित महुआ सेंटर ऑफ एक्सीलेंस इस बदलाव का केंद्र बनकर उभर रहा है, जहाँ महुआ को भोजन के रूप में स्थापित करने की वह सोच ज़मीनी स्तर पर आकार ले रही है, जिसकी परिकल्पना माननीय मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय जी द्वारा की गई है।
इसी क्रम में सुकमा जिले के कोंटा ब्लॉक अंतर्गत मुंडापल्ली ग्राम से 7 एवं तोंगपाल से 2 आदिवासी महिला SHG सदस्यों का एक दल जशपुर पहुँचा। यह दल PPIA फेलो अर्कजा कुथियाला के नेतृत्व में महुआ के फूड-ग्रेड संग्रहण, धूल-मुक्त सुखाने एवं प्रसंस्करण की व्यावहारिक प्रक्रियाओं को समझने हेतु एक्सपोज़र एवं फील्ड प्रशिक्षण कार्यक्रम में सम्मिलित हुआ।     प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश्य महुआ को केवल वनोपज के रूप में नहीं, बल्कि भोजन योग्य कच्चे माल (food-grade ingredient) के रूप में समझना था। फील्ड स्तर पर नेट-आधारित महुआ संग्रहण, ज़मीन से संपर्क से होने वाले जोखिम, स्वच्छ एवं नियंत्रित सुखाने की प्रक्रिया तथा प्रारंभिक हैंडलिंग के महत्व पर विशेष रूप से चर्चा एवं प्रदर्शन किया गया।
      महुआ के प्रसंस्करण से जुड़े सत्र महुआ सेंटर ऑफ एक्सीलेंस में आयोजित किए गए, जहाँ गुणवत्ता मानकों, निरंतरता और खाद्य सुरक्षा से जुड़े पहलुओं को व्यवहारिक उदाहरणों के माध्यम से समझाया गया। संपूर्ण प्रशिक्षण कार्यक्रम का संचालन समर्थ जैन द्वारा किया गया, जबकि अनिश्वरी भगत ने फील्ड-लेवल समन्वय में सहयोग प्रदान किया।
        इसके अतिरिक्त, प्रतिभागियों ने DST समर्थित परियोजना के अंतर्गत NIFTEM द्वारा स्थापित सोलर टनल ड्रायर का भी अवलोकन किया, जहाँ फल एवं सब्ज़ियों के नियंत्रित निर्जलीकरण (dehydration) की वैज्ञानिक प्रक्रिया को समझाया गया। इससे प्रतिभागियों को महुआ के साथ-साथ अन्य कृषि एवं वनोपज आधारित आजीविका विकल्पों पर भी व्यापक दृष्टिकोण मिला।
       इस पूरे प्रशिक्षण एवं एक्सपोज़र कार्यक्रम के दौरान जशपुर की टीम के साथ-साथ PPIA फेलो श्रीकांत एवं NRLM से गया प्रसाद  द्वारा ऑन-ग्राउंड गतिविधियों के समन्वय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई गई।
        महुआ सदियों से आदिवासी खाद्य परंपरा का हिस्सा रहा है। आज आवश्यकता है उसे स्वच्छता, गुणवत्ता और वैज्ञानिक प्रक्रियाओं के साथ पुनः खाद्य प्रणाली में स्थापित करने की। जशपुर में हो रहे ये प्रयास न केवल जिले की पहचान को नई दिशा दे रहे हैं, बल्कि महुआ को एक पारंपरिक संसाधन से आधुनिक खाद्य समाधान के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक ठोस कदम भी हैं।

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