मौत का मोड़” फिर बना हादसे का मैदान — सारंगडाँड़ में देर रात ट्रेलर पलटा, चीख-पुकार के बीच ड्राइवर की सांसें अटकीं, हर महीने 2 से 4 हादसे… जिम्मेदार अब भी गहरी नींद में

नारायणपुर : 26 अफ़्रैल 2026 - चराईडाँड़–बतौली स्टेट हाईवे का बनकोम्बो-सारंगडाँड़ हिस्सा अब “मौत का मोड़” बन चुका है, जहां हर गुजरने वाला पहिया खतरे के साये में चलता है। बीती रात करीब साढ़े 9 बजे एक बार फिर इस खतरनाक “अंधा मोड़” ने बड़ा हादसा निगलने की कोशिश की, जब बोकारो से सरिया लोड कर अनूपपुर जा रहा ट्रेलर (JH 09 BN 2366) अचानक मोड़ पर अनियंत्रित होकर सड़क पर ही पलट गया।
हादसे की आवाज इतनी जोरदार थी कि आसपास के घरों में दहशत फैल गई। मौके पर पहुंचे लोगों ने देखा कि ट्रेलर का अगला हिस्सा बुरी तरह दब चुका था और चालक उसी में फंसा जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहा था। ग्रामीणों ने बिना देर किए जान जोखिम में डालकर राहत कार्य शुरू किया और कड़ी मशक्कत के बाद ड्राइवर को बाहर निकाला। तुरंत नारायणपुर अस्पताल ले जाया गया, जहां इलाज के बाद उसकी हालत खतरे से बाहर बताई गई। अगर कुछ मिनट और देरी होती, तो यह हादसा जानलेवा साबित हो सकता था।
लेकिन यह कोई पहली घटना नहीं है… यही सबसे बड़ा सवाल है!
स्थानीय लोगों के मुताबिक सारंगडाँड़ का यह “अंधा मोड़” हर महीने 2 से 4 हादसों का गवाह बन रहा है। कई परिवार इस मोड़ की वजह से अपनों को खो चुके हैं, लेकिन सिस्टम अब भी खामोश है। यहां न तो कोई चेतावनी बोर्ड है, न ही स्पीड कंट्रोल की कोई व्यवस्था — यानी सड़क पर चलता हर वाहन खुद अपनी किस्मत के भरोसे है।
मोड़ की सबसे खतरनाक बात यह है कि इसके एक छोर में घने और ऊंचे पेड़ खड़े हैं, जो पूरी तरह दृश्यता को खत्म कर देते हैं। सामने से आ रही गाड़ी आखिरी पल में नजर आती है और तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। चालक के पास न संभलने का मौका होता है, न बचने का रास्ता — और बस एक झटके में सब कुछ खत्म!
ग्रामीणों का गुस्सा अब साफ दिखने लगा है। सरपंच सहित अन्य स्थानीय लोगों का कहना है कि कई बार सम्बंधित विभाग के कर्मचारियों को शिकायत करने के बावजूद विभाग ने न तो पेड़ों की छंटाई कराई और न ही चेतावनी संकेतक लगाए। हर हादसे के बाद सिर्फ अफसोस जताया जाता है, लेकिन जमीनी कार्रवाई शून्य है।
लोगों का कहना है — बनकोम्बो से नारायणपुर कपरीनाला तक 3 से 4 खतरनाक ओर अंधा मोड़ है विभाग की लाफ़रवाही इतनी चरम पर है कि कंन्ही भी चेतावनी के सांकेतिक बोर्ड नही लगाया गया है। सारंगडाँड़ में अगर समय रहते इस “अंधा मोड़” पर पेड़ों की छंटाई कर दी जाए, दोनों ओर बड़े-बड़े चेतावनी के संकेतक बोर्ड लगा दिए जाएं तो 95% हादसे रोके जा सकते हैं। लेकिन सवाल यही है कि आखिर विभाग कब जागेगा?
फिलहाल, सारंगडाँड़ का यह मोड़ हर दिन एक नए हादसे का इंतजार करता नजर आ रहा है… और हर गुजरती गाड़ी के साथ दहशत भी दौड़ रही है। अब देखना यह है कि जिम्मेदारों की नींद कब टूटती है — या फिर किसी बड़े हादसे के बाद ही चेतना आएगी!
सुनिए क्या कहते हैं ग्रामीण :-
