चैती छठ महापर्व : छठी मैया की आराधना में लीन हुआ जशपुर, तालाबों और घाटों पर सजी भक्ति की भव्य छटा, व्रतियों ने जल में खड़े होकर अस्त होते सूर्य को अर्पित किया अर्घ्य, गूंजे लोकगीत और जयकारे
जशपुरनगर 24बमार्च — लोक आस्था, अनुशासन और अटूट विश्वास के प्रतीक चैती छठ महापर्व का तीसरा और सर्वाधिक महत्वपूर्ण दिन मंगलवार को पूरे धार्मिक उल्लास और भक्ति भाव के साथ संपन्न हुआ। नहाय-खाय और खरना जैसे पवित्र अनुष्ठानों के पश्चात आज व्रती महिलाओं ने अस्ताचलगामी सूर्य को संध्या अर्घ्य अर्पित कर अपने परिवार की सुख-समृद्धि, आरोग्य और संतान की दीर्घायु की मंगलकामना की।
संध्या होते ही शहर के विभिन्न घाटों, तालाबों और पवित्र जलाशयों पर श्रद्धालुओं की अपार भीड़ उमड़ पड़ी। वातावरण ‘छठी मैया’ के गीतों, मंत्रोच्चार और लोक भजनों से गुंजायमान हो उठा। व्रती महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में सजे हुए डलिया और सूप में ठेकुआ, फल, नारियल एवं अन्य प्रसाद लेकर जल में खड़ी होकर भगवान भास्कर को अर्घ्य अर्पित करती नजर आईं। पूरा परिवेश श्रद्धा, समर्पण और आध्यात्मिक ऊर्जा से ओत-प्रोत दिखाई दिया।
चार दिवसीय इस महापर्व के क्रम में दूसरे दिन खरना का अनुष्ठान विधिवत संपन्न होने के बाद व्रती 36 घंटे के निर्जला उपवास का पालन कर रही हैं। मंगलवार को चैत्र शुक्ल षष्ठी तिथि पर अस्त होते सूर्य को पहला अर्घ्य अर्पित किया गया, जबकि बुधवार, 25 मार्च को चैत्र शुक्ल सप्तमी तिथि पर उदीयमान सूर्य को प्रातःकालीन अर्घ्य अर्पित कर इस पावन पर्व का समापन होगा। इसके उपरांत व्रती कच्चे दूध और प्रसाद ग्रहण कर व्रत का पारण करेंगी।
इस वर्ष छठ महापर्व के तीसरे दिन रोहिणी नक्षत्र और प्रीति योग का दुर्लभ संयोग बनने से इसकी आध्यात्मिक महत्ता और अधिक बढ़ गई है। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार यह योग अत्यंत शुभ और कल्याणकारी फल प्रदान करने वाला माना जाता है, जिससे व्रतियों की मनोकामनाएं पूर्ण होने की मान्यता है।
छठ पूजा में स्वच्छता और शुद्धता का विशेष महत्व होता है। व्रती प्रसाद निर्माण से लेकर पूजा सामग्री तक हर वस्तु की पवित्रता का विशेष ध्यान रखते हैं। व्रत के दौरान घरों में लहसुन-प्याज का पूर्णतः त्याग कर सात्विक भोजन ग्रहण किया जाता है। व्रती भूमि पर शयन कर संयम और साधना का पालन करते हैं तथा मन, वचन और कर्म की पवित्रता बनाए रखते हुए छठी मैया की आराधना में लीन रहते हैं।
जशपुरनगर में छठ महापर्व का यह अनुपम दृश्य न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक बना, बल्कि सामाजिक एकता, अनुशासन और सांस्कृतिक समरसता का भी अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करता नजर आया।
