जहां अध्यात्म के साथ सेवा और मानवता को मिलता है महत्व, उस सोगड़ा आश्रम में श्रद्धा के साथ मनाया गया 31वां वार्षिकोत्सव, बाबा औघड़ गुरुपद संभव राम जी ने कहा—विवेक, विनम्रता और साधना से प्रशस्त होता है आत्मकल्याण का मार्ग-साथ ही हुआ निःशुल्क चिकित्सा शिविर और जरूरतमंदों की सेवा
ब्रह्मनिष्ठालय में अघोरेश्वर चरणपादुका, शिवलिंग एवं प्रतिमा स्थापना का 31वां वार्षिकोत्सव श्रद्धा और भक्ति के साथ संपन्न, बाबा औघड़ गुरुपद संभव राम जी ने विवेक, संतोष और साधना को बताया आत्मकल्याण का मार्ग

नारायणपुर/जशपुर। छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले के सोगड़ा स्थित ब्रह्मनिष्ठालय शक्रधर ग्राम आश्रम में अध्यात्म, साधना, सेवा और मानव कल्याण की प्रेरणा से ओतप्रोत वातावरण के बीच परमपूज्य अघोरेश्वर महाविभूति स्थल पर चरणपादुका, शिवलिंग एवं प्रतिमा स्थापना का 31वां वार्षिकोत्सव श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया गया। दो दिवसीय वार्षिकोत्सव के अंतर्गत मंगलवार, 27 अक्टूबर 2026 को आयोजित गोष्ठी में बाबा भगवान राम ट्रस्ट के अध्यक्ष पूज्यपाद बाबा औघड़ गुरुपद संभव राम जी ने अपने आशीर्वचनों के माध्यम से मनुष्य जीवन की सार्थकता, आत्मकल्याण, संतोष, सेवा, विनम्रता और साधना के महत्व को विस्तार से समझाया। इस अवसर पर आश्रम परिसर आध्यात्मिक चेतना, गुरु-वाणी, भक्ति और लोकसेवा की भावना से गुंजायमान रहा। वार्षिकोत्सव में जहां एक ओर साधकों को जीवन में विवेक और आत्मानुशासन अपनाने की प्रेरणा मिली, वहीं दूसरी ओर निःशुल्क चिकित्सा शिविर तथा जरूरतमंदों के बीच वस्त्र एवं कंबल वितरण जैसे सेवा कार्यों के माध्यम से आश्रम की जनकल्याणकारी भावना भी साकार हुई।

महापुरुषों की वाणी को जीवन में उतारना ही सत्संग की सार्थकता
गोष्ठी को संबोधित करते हुए पूज्यपाद बाबा औघड़ गुरुपद संभव राम जी ने कहा कि सत्संग में महापुरुषों की वाणी सुनना तभी सार्थक होता है, जब व्यक्ति उस पर गंभीरता से मनन करे और अपने व्यवहार तथा आचरण में उसे स्थान दे। केवल उपदेश सुन लेने से जीवन में परिवर्तन नहीं आता, बल्कि उसके अनुरूप अपने विचारों और कर्मों को ढालना आवश्यक है। मनुष्य जीवन अत्यंत दुर्लभ है और इसी जीवन में आत्मकल्याण तथा मुक्ति की दिशा में आगे बढ़ने का अवसर प्राप्त होता है। इसलिए मनुष्य को अपने सांसारिक दायित्वों का निर्वहन करते हुए आत्मिक उन्नति के लिए भी निरंतर प्रयास करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि जीवन का उद्देश्य केवल धन अर्जित करना, पद-प्रतिष्ठा प्राप्त करना अथवा भौतिक सुख-सुविधाओं का विस्तार करना नहीं है। वास्तविक उन्नति तभी सार्थक होती है, जब उसके साथ संतोष, विनम्रता, सेवा और परोपकार की भावना भी विकसित हो। मनुष्य की इच्छाएं यदि असीमित होती जाएं तो उपलब्धियां प्राप्त करने के बाद भी उसके भीतर असंतोष बना रहता है। इसके विपरीत विवेकपूर्ण जीवन, संतुलित विचार और संतोष की भावना व्यक्ति को मानसिक शांति प्रदान करती है।
संतोष, विनम्रता और परोपकार से ही जीवन बनता है सार्थक
पूज्य गुरुदेव ने अपने आशीर्वचनों में बताया कि धन, विद्या, बुद्धि और ज्ञान का अहंकार व्यक्ति की आध्यात्मिक उन्नति में बाधा बन सकता है। मनुष्य को अपनी उपलब्धियों पर गर्व करने के बजाय विनम्र बने रहना चाहिए तथा समय-समय पर आत्मनिरीक्षण करते हुए अपने आचरण में सुधार करना चाहिए। वास्तविक ज्ञान वही है, जो व्यक्ति को दूसरों के प्रति संवेदनशील बनाए और उसके भीतर सेवा तथा सहयोग की भावना जागृत करे।
उन्होंने समस्त प्राणियों में एक ही महाप्राण का अंश विद्यमान होने की आध्यात्मिक अवधारणा को रेखांकित करते हुए कहा कि दूसरों की सहायता करना, जरूरतमंदों के दुख-दर्द को समझना और उनके विकास के लिए प्रयास करना भी आध्यात्मिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। मानवता के प्रति करुणा, दया और सहानुभूति का भाव व्यक्ति को संकीर्ण स्वार्थ से ऊपर उठाता है। जब मनुष्य अपने सुख के साथ दूसरों के कल्याण के विषय में भी सोचने लगता है, तब उसके जीवन में सेवा और साधना का वास्तविक महत्व प्रकट होता है।
सुख-दुःख में विवेक और धैर्य बनाए रखना आवश्यक
संसार की क्षणभंगुरता का बोध कराते हुए बाबा औघड़ गुरुपद संभव राम जी ने कहा कि जीवन में सुख-दुःख, अनुकूलता-प्रतिकूलता और उतार-चढ़ाव स्वाभाविक हैं। परिस्थितियां हमेशा एक जैसी नहीं रहतीं। ऐसे में व्यक्ति को कठिन समय में निराश होने अथवा अनुकूल परिस्थितियों में अहंकार करने के बजाय विवेक और धैर्य के साथ आगे बढ़ना चाहिए।
उन्होंने कहा कि परिवार और संतान के प्रति जिम्मेदारियों का निर्वहन करना प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है, लेकिन इन दायित्वों के बीच संसार की अनित्यता को भी समझना जरूरी है। महापुरुषों की वाणी व्यक्ति को जीवन की वास्तविकताओं से परिचित कराती है और कठिन परिस्थितियों में मानसिक संतुलन बनाए रखने की प्रेरणा देती है। विवेक के अभाव में व्यक्ति छोटी-छोटी समस्याओं से विचलित हो सकता है, जबकि धैर्य और संतुलित दृष्टिकोण उसे सही निर्णय लेने में सहायता प्रदान करते हैं।
ध्यान-साधना के लिए मन की स्थिरता और आत्मनिरीक्षण जरूरी
ध्यान और साधना के विषय में मार्गदर्शन देते हुए पूज्य गुरुदेव ने कहा कि मन की स्थिरता, धैर्य और गंभीरता साधना के प्रारंभिक सोपान हैं। मन को जल्दबाजी में नियंत्रित करने अथवा बलपूर्वक शांत करने के बजाय व्यक्ति को शांत भाव से अपने भीतर उठने वाले विचारों और भावनाओं को समझने का प्रयास करना चाहिए। नियमित अभ्यास, संयम और आत्मनिरीक्षण से ही साधना की दिशा में आगे बढ़ना संभव है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि आध्यात्मिकता केवल ज्ञान की चर्चा करने अथवा धार्मिक विषयों पर विचार व्यक्त करने तक सीमित नहीं है। इसका वास्तविक महत्व निरंतर अभ्यास, आत्मानुशासन और आत्मानुभूति में निहित है। साधना के मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति को धैर्य रखना चाहिए और अपनी कमियों को पहचानकर उनमें सुधार करने का प्रयास करना चाहिए। आत्मकल्याण का मार्ग किसी बाहरी प्रदर्शन से नहीं, बल्कि व्यक्ति के आंतरिक परिवर्तन और निरंतर साधना से प्रशस्त होता है।

आश्रम समाज को देता है विवेक, ज्ञान और आत्मविकास की दिशा
सोगड़ा आश्रम की भूमिका और उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए बाबा औघड़ गुरुपद संभव राम जी ने कहा कि आश्रमों का मूल उद्देश्य लोगों को ज्ञान, विवेक और आत्मविकास की दिशा प्रदान करना है। आश्रम केवल धार्मिक आयोजनों के केंद्र नहीं, बल्कि ऐसे स्थल हैं, जहां मनुष्य को अपने जीवन को बेहतर बनाने, सद्विचार अपनाने और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझने की प्रेरणा मिलती है।
उन्होंने कहा कि आश्रमों को दिया जाने वाला सहयोग उनकी वास्तविक आवश्यकताओं और जनकल्याण के उद्देश्यों के अनुरूप होना चाहिए। गुरु व्यक्ति को मार्गदर्शन प्रदान करते हैं और सही दिशा दिखाते हैं, लेकिन अपने लक्ष्य तक पहुंचने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं प्रयास करना पड़ता है। केवल मार्गदर्शन प्राप्त कर लेने से लक्ष्य हासिल नहीं होता। उसके लिए आत्मानुशासन, निरंतर प्रयत्न और अपने कर्तव्यों के प्रति निष्ठा आवश्यक है।
पूज्य गुरुदेव के अनुसार आत्मकल्याण का मार्ग व्यक्तिगत साधना, संयम और सतत प्रयास से ही प्रशस्त होता है। मनुष्य को अपने जीवन में सद्विचारों को स्थान देते हुए उन्हें व्यवहार में उतारना चाहिए। यही प्रक्रिया व्यक्ति के भीतर सकारात्मक परिवर्तन लाती है और उसे समाज के लिए उपयोगी बनने की प्रेरणा देती है।
सभी के जीवन में करुणा, मैत्री और भाईचारे की भावना विकसित हो
अपने आशीर्वचनों के अंत में बाबा औघड़ गुरुपद संभव राम जी ने ईश्वर से प्रार्थना की कि सभी को सद्बुद्धि और विवेक प्राप्त हो तथा गुरु-शिष्य एक भाव से मिल-जुलकर रहें। प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में करुणा, दया, मैत्री, प्रेम और भाईचारे की भावना विकसित हो। समाज में परस्पर सहयोग, सद्भाव और मानवता का भाव मजबूत बने तथा लोग एक-दूसरे के सुख-दुःख में सहभागी बनें।
उनके संदेश में जीवन के प्रति संतुलित दृष्टिकोण, दूसरों के प्रति संवेदनशीलता और आध्यात्मिक मूल्यों को आचरण में अपनाने की प्रेरणा प्रमुख रूप से दिखाई दी। वार्षिकोत्सव की गोष्ठी में प्रस्तुत विचारों ने साधकों और उपस्थित श्रद्धालुओं को आत्मचिंतन, सेवा तथा साधना के महत्व का संदेश दिया।
अखंड संकीर्तन, पूजन-आरती और आध्यात्मिक कार्यक्रमों से भक्तिमय हुआ आश्रम
वार्षिकोत्सव के अवसर पर धार्मिक एवं आध्यात्मिक कार्यक्रमों की शुरुआत सोमवार, 26 अक्टूबर से ही हो गई थी। मंगलवार को प्रातःकालीन सफाई और श्रमदान के बाद सुबह 9 बजे पूज्यपाद बाबा औघड़ गुरुपद संभव राम जी ने परमपूज्य अघोरेश्वर महाविभूति स्थल पर महाप्रभु की चरणपादुका, शिवलिंग एवं प्रतिमा का पूजन-अर्चन किया। इसके बाद आरती के साथ सोमवार से प्रारंभ हुए ‘अघोरन्ना परो मंत्र: नास्ति तत्वं गुरो: परम्’ के अखंड संकीर्तन का समापन हुआ।
इसके पश्चात श्री पृथ्वीपाल जी ने सफलयोनि का पाठ किया। रांची शाखा के युवा सैनिकों ने मंगलाचरण प्रस्तुत कर कार्यक्रम को आध्यात्मिक गरिमा प्रदान की। इसके बाद आयोजित गोष्ठी में विभिन्न क्षेत्रों से आए वक्ताओं ने अपने विचार रखे।
गोष्ठी के अन्य वक्ताओं में श्री उदय नारायण पाण्डेय, सेवानिवृत्त मलेरिया अधिकारी; श्री सर्वेश्वर नाथ नामदेव, गैप इंडिया के डायरेक्टर; श्री तेजबल सिंह, जिला आपूर्ति पदाधिकारी, देहरादून सचिवालय, उत्तराखंड; तथा डॉ. आशुतोष त्रिपाठी, वाड्रफनगर, छत्तीसगढ़ शामिल रहे। वक्ताओं की सहभागिता से कार्यक्रम में आध्यात्मिक चिंतन और सामाजिक सरोकारों से जुड़े विषयों को स्थान मिला।

निःशुल्क चिकित्सा शिविर में 1832 मरीजों का परीक्षण, विशेषज्ञ चिकित्सकों ने दी सेवाएं
सोगड़ा आश्रम के वार्षिकोत्सव का महत्वपूर्ण पक्ष जनसेवा से जुड़ी गतिविधियां रहीं। इस अवसर पर आयोजित निःशुल्क चिकित्सा शिविर में लगभग 1832 मरीजों का विशेषज्ञ चिकित्सकों द्वारा स्वास्थ्य परीक्षण किया गया। संस्था की ओर से मरीजों को आवश्यक दवाइयां भी निःशुल्क उपलब्ध कराई गईं। शिविर में विभिन्न चिकित्सा विधाओं के विशेषज्ञों ने अपनी सेवाएं देकर जरूरतमंद लोगों को उपचार और स्वास्थ्य संबंधी परामर्श उपलब्ध कराया।
शिविर में जनरल फिजिशियन, दंत रोग विशेषज्ञ, सर्जन, हृदय रोग विशेषज्ञ, महिला रोग विशेषज्ञ, बाल रोग विशेषज्ञ और नेत्र सर्जन सहित होम्योपैथी, इलेक्ट्रो होम्योपैथी, फिजियोथेरेपी, एक्यूप्रेशर, एक्यूपंक्चर, ओस्टियोपैथी तथा आयुर्वेद से जुड़े विशेषज्ञ उपस्थित रहे। विभिन्न प्रांतों से आए सर्वेश्वरी समूह के कुल 27 विशेषज्ञ चिकित्सकों ने शिविर में अपनी सेवाएं प्रदान कीं।
स्वास्थ्य परीक्षण को और उपयोगी बनाने के लिए शिविर में रक्त शर्करा, मलेरिया और टाइफाइड की जांच की निःशुल्क व्यवस्था भी की गई थी। इसके अतिरिक्त हाथ से दबाव डालकर मांसपेशियों की क्षमता जांचने की सुविधा उपलब्ध कराई गई। इससे मरीजों को एक ही स्थान पर विभिन्न प्रकार की जांच और विशेषज्ञों से परामर्श प्राप्त करने का अवसर मिला।
आश्रम में आयोजित यह शिविर इस बात का उदाहरण रहा कि आध्यात्मिक आयोजनों के साथ स्वास्थ्य सेवा को जोड़कर समाज के जरूरतमंद वर्ग तक प्रत्यक्ष सहायता पहुंचाई जा सकती है। निःशुल्क परीक्षण और दवा वितरण से उन लोगों को राहत मिली, जिनके लिए उपचार की व्यवस्था करना कठिन हो सकता है। इस तरह वार्षिकोत्सव ने आध्यात्मिक संदेश के साथ स्वास्थ्य और लोककल्याण को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया।
वनवासी परिवारों के बीच वस्त्र और कंबल वितरण, सेवा भावना का दिया संदेश
वार्षिकोत्सव के अंतर्गत जरूरतमंद वनवासी महिलाओं, पुरुषों, बच्चों और वृद्धजनों की सहायता के लिए भी पहल की गई। मंगलवार को लगभग शाम 4 बजे जरूरतमंद लोगों के बीच नए तथा स्वच्छ किए गए वस्त्रों और कंबलों का वितरण किया गया। इस सेवा गतिविधि का उद्देश्य जरूरतमंद परिवारों तक उपयोगी सामग्री पहुंचाना और उनके प्रति सहयोग एवं संवेदना की भावना को मजबूत करना रहा।
वस्त्र एवं कंबल वितरण जैसे कार्य आश्रम की सेवा-परंपरा और सामाजिक दायित्वों के प्रति प्रतिबद्धता को सामने लाते हैं। आध्यात्मिक जीवन में करुणा और परोपकार को महत्वपूर्ण मानने की भावना तब अधिक सार्थक दिखाई देती है, जब जरूरतमंद लोगों की आवश्यकताओं को समझकर उनकी सहायता की जाती है। चिकित्सा शिविर के साथ वस्त्र और कंबल वितरण ने वार्षिकोत्सव को जनसेवा से जोड़ते हुए व्यापक सामाजिक महत्व प्रदान किया।
आध्यात्मिक चेतना के साथ जनकल्याण की प्रेरणा देता है सोगड़ा आश्रम
जशपुर जिले के सोगड़ा स्थित ब्रह्मनिष्ठालय आश्रम में आयोजित 31वां वार्षिकोत्सव श्रद्धा, साधना, सत्संग और सेवा के समन्वय का अवसर बना। एक ओर पूज्यपाद बाबा औघड़ गुरुपद संभव राम जी ने संतोष, विवेक, विनम्रता और आत्मानुशासन के माध्यम से जीवन को सार्थक बनाने का संदेश दिया, वहीं दूसरी ओर निःशुल्क चिकित्सा शिविर और जरूरतमंदों के बीच वस्त्र-कंबल वितरण जैसे कार्यों ने मानव सेवा के महत्व को रेखांकित किया।
