धरती माता के रजस्वला होने की मान्यता के साथ शुरू हुआ आस्था का पर्व, तीन दिनों तक थम जाएंगे हल-बैल, बंद रहेंगे मिट्टी से जुड़े कार्य, गांव-गांव में दिखेगा परंपरा और श्रद्धा का अद्भुत संगम
पूजा-पाठ से लेकर खेती-किसानी तक पर रहेगा विशेष संयम, ग्रामीण अंचलों में पीढ़ियों से निभाई जा रही है परंपरा
नारायणपुर/जशपुर/स्थानीय प्रतिनिधि। भारतीय संस्कृति और लोक परंपराओं में प्रकृति को माता का स्वरूप मानकर उसकी पूजा-अर्चना करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। इसी कड़ी में आज से ग्रामीण अंचलों में अत्यंत श्रद्धा और आस्था के साथ मनाए जाने वाले रजस्वला पर्व का शुभारंभ हो गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इन दिनों धरती माता रजस्वला होती हैं, इसलिए उन्हें विश्राम देने और सम्मान प्रकट करने के उद्देश्य से खेती-किसानी तथा भूमि से जुड़े अधिकांश कार्यों को तीन दिनों के लिए रोक दिया जाता है।
ग्रामीण क्षेत्रों में इस पर्व को लेकर विशेष उत्साह और धार्मिक वातावरण देखने को मिल रहा है। गांवों में बुजुर्गों से लेकर युवा पीढ़ी तक इस परंपरा का पालन कर रही है। मान्यता है कि जिस प्रकार परिवार में रजस्वला अवधि के दौरान महिलाओं को विश्राम दिया जाता है, उसी प्रकार धरती माता को भी इन दिनों विश्राम दिया जाना चाहिए। इसी कारण खेतों में हल नहीं चलाया जाता और भूमि की खुदाई जैसे कार्य पूरी तरह बंद रखे जाते हैं।
खेतों में नहीं चलेगा हल, मिट्टी की खुदाई कार्यों पर भी रहेगा विराम
रजस्वला पर्व के दौरान किसान खेतों में जुताई, बुआई या अन्य कृषि कार्य नहीं करते। हल-बैल और कृषि उपकरणों को भी विश्राम दिया जाता है। इसके अलावा मकान निर्माण, कुआं, तालाब, नाली, सड़क या अन्य कार्यों के लिए मिट्टी की खुदाई करना भी धार्मिक दृष्टि से वर्जित माना जाता है।
ग्रामीणों का मानना है कि इन दिनों धरती माता विश्राम की अवस्था में रहती हैं, इसलिए भूमि को किसी भी प्रकार से क्षति पहुंचाने वाले कार्य नहीं किए जाने चाहिए। यही कारण है कि गांवों में इन नियमों का पालन बड़ी श्रद्धा और अनुशासन के साथ किया जाता है।
पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों में भी बरती जाती है विशेष सावधानी
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार रजस्वला अवधि में कई लोग नियमित पूजा-पाठ, विशेष अनुष्ठान और धार्मिक आयोजनों को बन्द कर देते हैं। कई मंदिरों में भी परंपरानुसार विशेष नियम लागू रहते हैं। रजस्वला अवधि समाप्त होने के बाद शुद्धिकरण एवं विशेष पूजा-अर्चना के साथ धार्मिक गतिविधियां पुनः प्रारंभ की जाती हैं।
प्रकृति के सम्मान और पर्यावरण संरक्षण का संदेश देता है यह लोकपर्व
धार्मिक विद्वानों और समाज के वरिष्ठजनों का कहना है कि रजस्वला पर्व केवल आस्था का विषय नहीं है, बल्कि यह प्रकृति और पर्यावरण के प्रति सम्मान का संदेश भी देता है। धरती को माता मानकर कुछ दिनों तक उसे विश्राम देना मानव और प्रकृति के बीच संतुलन स्थापित करने की भावना का प्रतीक माना जाता है।
आज के आधुनिक दौर में भी ग्रामीण समाज इस परंपरा को पूरी श्रद्धा से निभा रहा है। यही कारण है कि गांव-गांव में रजस्वला के दौरान धार्मिक अनुशासन, सांस्कृतिक मूल्यों और प्रकृति के प्रति सम्मान की अनूठी मिसाल देखने को मिलती है।
ग्रामीण बोले— “धरती माता का सम्मान हमारी संस्कृति की पहचान”
ग्रामीण अंचलों में बुजुर्गों का कहना है कि यह परंपरा उनके पूर्वजों से चली आ रही है और आज भी लोग इसे पूरी निष्ठा के साथ निभाते हैं। उनका मानना है कि धरती ही जीवन का आधार है, इसलिए उसके प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करना प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है।
आस्था, परंपरा और प्रकृति संरक्षण के संदेश से जुड़ा यह आगामी तीन दिनों तक ग्रामीण जीवन की दिनचर्या को विशेष रूप से प्रभावित करेगा। इसके बाद शुद्धिकरण और विशेष पूजा-अर्चना के साथ खेती-किसानी एवं अन्य कार्यों की पुनः शुरुआत होगी, लेकिन तब तक गांवों में धरती माता को विश्राम देने की यह सदियों पुरानी परंपरा पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ निभाई जाएगी।
