भादो एकादशी पर नारायणपुर के गांवों में दिखी करमा पर्व की खास रौनक, भाइयों की लंबी उम्र के लिए बहनों ने रखा व्रत, करम डाली की पूजा के बाद करमा-धरमा की कथा और रातभर चला पारंपरिक नृत्य, सुबह नदी में करम डाली के विसर्जन के साथ हुआ पर्व का समापन
नारायणपुर। नारायणपुर क्षेत्र के ग्रामीण अंचलों में मंगलवार को भाई-बहन के अटूट प्रेम, सुख-समृद्धि और प्रकृति के प्रति आस्था का प्रतीक करमा एकादशी यानी करम पर्व पूरे उत्साह और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया गया। भादो शुक्ल पक्ष की एकादशी के अवसर पर गांव-गांव में करम देवता की पूजा-अर्चना की गई। पर्व को लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में सुबह से ही उत्साह का माहौल रहा। खासकर युवतियों ने अपने भाइयों की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और परिवार की खुशहाली की कामना करते हुए व्रत रखा।
करमा पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण जीवन, लोकपरंपरा, प्रकृति और पारिवारिक रिश्तों को एक साथ जोड़ने वाला महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है। यही वजह है कि नारायणपुर क्षेत्र के गांवों में इस पर्व की तैयारी कई दिन पहले से शुरू हो जाती है। भादो चतुर्थी से ही कुंवारी कन्याओं द्वारा पर्व की परंपरागत शुरुआत की जाती है। कन्याएं नदी अथवा जलस्रोत में स्नान कर वहां से रेत मिट्टी लाती हैं और उसमें विभिन्न अनाजों का जावा तैयार करती हैं। इसके बाद सात दिनों तक जावा की सेवा, पूजा और देखभाल की जाती है। सात दिनों तक चलने वाली यह परंपरा ग्रामीण संस्कृति में करमा पर्व के प्रति श्रद्धा और सामूहिक सहभागिता को दर्शाती है।
नारायणपुर क्षेत्र में करमा एकादशी के दिन ग्रामीण परंपरा के अनुसार भाइयों द्वारा करम वृक्ष के पास पहुंचकर विधि-विधान से पूजा-अर्चना की गई। पूजा के बाद करम वृक्ष की डाली को परंपरागत तरीके से काटकर ढोल, नगाड़े और मांदर की थाप के बीच गांव के उस स्थान तक लाया गया, जहां प्रत्येक वर्ष करमा पूजा का आयोजन किया जाता है। करम डाली को निर्धारित स्थान पर विधि-विधान से स्थापित किया गया। इसके बाद व्रत रखीं कन्याओं और महिलाओं ने शाम करीब सात बजे करम डाली की पूजा-अर्चना कर परिवार और भाइयों की सुख-समृद्धि की कामना की।
पूजा के दौरान करम डाली को प्रकृति और करम देवता का प्रतीक मानकर उसकी आराधना की गई। ग्रामीणों ने प्रकृति के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हुए सुखी जीवन, परिवार की खुशहाली और आपसी प्रेम की कामना की। पूजा स्थल पर ग्रामीणों की भीड़ जुटी रही और पारंपरिक लोकगीतों से पूरा वातावरण भक्तिमय और उत्सवमय बना रहा।

करमा को भाई मानकर राखी बांधती है बहन
माना जाता है कि जिस तरह से बहन, भाई को राखी बांधती है ठीक उसी तरह बहन करमा को भाई मानकर राखी स्वरूप इसे बांधती है, ताकि करम उसकी जीवनभर रक्षा करें. बहन अपने भाई की सलामती के लिए दिनभर उपवास करती है और रात में पूजा करती है. रातभर बहनें इस दिन सोती भी नहीं है.
करमा पूजा में करमा-धरमा की कथा का विशेष महत्व रहा। पूजा के बाद ग्रामीणों को करमा-धरमा की पारंपरिक कथा सुनाई गई। लोकमान्यता के अनुसार करमा और धरमा दो भाइयों की कथा करमा पर्व की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ग्रामीण क्षेत्रों में मान्यता है कि करमा-धरमा की कथा सुने बिना करमा पूजा की परंपरा पूर्ण नहीं मानी जाती। कथा के दौरान ग्रामीणों ने पूरी श्रद्धा के साथ लोकपरंपरा को सुना और नई पीढ़ी को भी इस पारंपरिक कथा से परिचित कराया।
करमा पर्व की सबसे खास पहचान पूजा के बाद होने वाला पारंपरिक करमा नृत्य रहा। कथा समाप्त होने के बाद ढोल, नगाड़ों और मांदर की थाप गूंजने लगी और युवक-युवतियां तथा महिलाएं पारंपरिक गीतों के साथ करमा नृत्य में शामिल हुए। रात बढ़ने के साथ करमा गीत और नृत्य का उत्साह भी बढ़ता गया। गांव के पूजा स्थल पर देर रात तक लोकगीतों की गूंज और मांदर की थाप सुनाई देती रही। कई स्थानों पर यह पारंपरिक नृत्य सुबह तक चलता रहा।
करमा पर्व में तैयार किए जाने वाले जावा का भी विशेष महत्व है। अनाज और मिट्टी से तैयार जावा को सात दिनों तक श्रद्धापूर्वक रखा और पूजा जाता है। पूजा-अर्चना के बाद इसे प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है तथा परिवार और आसपास के लोगों के बीच बांटा जाता है।
करमा पर्व को भाई-बहन के प्रेम और विश्वास का पर्व भी माना जाता है। बहनें व्रत रखकर करम देवता से अपने भाइयों की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। वहीं भाई भी अपनी बहनों के प्रति स्नेह और जिम्मेदारी की भावना व्यक्त करते हैं।
पर्व के अंतिम चरण में रातभर करमा नृत्य और लोकगीतों के बाद सूर्योदय के समय विधि-विधान से स्थापित करम डाली को नदी अथवा जलस्रोत में विसर्जित किया गया। इसके साथ ही करमा एकादशी के पारंपरिक अनुष्ठान का समापन हुआ। पूरे आयोजन के दौरान ग्रामीणों ने अपनी लोकसंस्कृति, परंपरा और आस्था को जीवंत बनाए रखा।
नारायणपुर क्षेत्र के ग्रामीण अंचलों में मनाया गया करमा पर्व इस बात का जीवंत उदाहरण बना कि आधुनिक समय में भी गांवों की परंपराएं लोगों को अपनी संस्कृति और जड़ों से जोड़े हुए हैं। करम डाली की पूजा से लेकर करमा-धरमा की कथा, जावा की परंपरा, भाई-बहन के स्नेह और रातभर चलने वाले करमा नृत्य तक, पूरे आयोजन में ग्रामीण संस्कृति की समृद्ध झलक देखने को मिली। मांदर की थाप और लोकगीतों के बीच ग्रामीणों ने प्रकृति, परिवार और परंपरा के प्रति अपनी आस्था व्यक्त करते हुए करमा पर्व को उत्साहपूर्वक मनाया।
